गैरसैंण पर सीएम त्रिवेंद्र का मास्टर स्ट्रोक, देहरादून स्वत: ही स्थायी राजधानी


देहरादून । उत्तराखंड के अलग राज्य के रूप में वजूद में आने के ठीक 19 साल और चार महीने बाद आखिरकार सरकार ने गैरसैंण को राजधानी, ग्रीष्मकालीन ही सही, घोषित कर दिया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिस अंदाज में बजट पेश करने के बाद यह मास्टर स्ट्रोक खेला, उससे कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष एकबारगी चौंक पड़ा। कांग्रेस गैरसैंण मुद्दे पर प्रदेश की भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति पर चल रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री के एलान के बाद उसके पास ताली बजाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। महत्वपूर्ण बात यह कि मुख्यमंत्री के एलान से देहरादून को स्थायी राजधानी बनाए जाने का रास्ता भी साफ हो गया है।


उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में नौ नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। उस समय केंद्र में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपानीत राजग सरकार थी। उत्तराखंड के लिए गठित पहली अंतरिम विधानसभा में भाजपा का बहुमत होने के कारण अंतरिम सरकार बनाने का मौका भी भाजपा को ही मिला।


तब देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया। दरअसल, पहले ही दिन से राजधानी को लेकर जिस तरह स्टैंड साफ नहीं किया गया, उसका ही नतीजा है कि 19 साल तक राज्य इस मामले में दोराहे पर खड़ा रहा। इन 19 सालों में गैरसैंण के नाम पर सियासी पार्टियों ने जन भावनाओं का जमकर दोहन तो किया मगर इस सवाल का जवाब देने को कोई तैयार नहीं दिखा कि गैरसैंण का भविष्य क्या है।  


गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की मांग वर्ष 1992 में उत्तराखंड क्रांति दल ने उठाई थी। अलग राज्य के वजूद में आने के बारह साल बाद जब कांग्रेस 2012 में दूसरी बार सत्ता में आई तो गैरसैंण को लेकर सरकार ने खासी तेजी दिखाई। लगा कि इस बार शायद राजधानी पर कोई अंतिम फैसला सामने आ ही जाएगा। 


पहली बार किसी सरकार ने गैरसैंण का महत्व प्रदर्शित करने के लिए यहां कैबिनेट बैठक की। यही नहीं, लगातार पांच साल गैरसैंण में विधानसभा का संक्षिप्त सत्र आयोजित किया गया। पिछले साल हालांकि यह क्रम टूटा। 


उत्तराखंड में सत्ता में रही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस का रवैया गैरसैंण के मामले में आज से पहले तक एक जैसा टालमटोल वाला रहा। 


मुद्दा सियासत से जुड़ा था तो दोनों पार्टियों ने इसे अपनी सुविधा के मुताबिक इस्तेमाल किया। दरअसल, सियासी पार्टियों के लिए गैरसैंण को राजधानी न बनाए जाने के मूल में विधानसभा सीटों का गणित सबसे बड़ी बाधा बना। 2007-08 में हुए विधानसभा सीटों के नए परिसीमन के बाद सूबे की कुल 70 में से अधिकांश सीटें मैदानी इलाकों में चली गईं। 


इनमें देहरादून की 10, हरिद्वार की 11 ऊधमसिंह नगर जिले की नौ सीटें तो हैं ही, इनके अलावा पौड़ी गढ़वाल की एक, नैनीताल की चार विधानसभा सीटें भी मैदानी भूगोल की हैं। यानी कुल विधानसभा सीटों की ठीक आधी, 35 सीटें मैदानी क्षेत्र में हैं और यही वह वजह है, जिससे कांग्रेस और भाजपा गैरसैंण की हिमायत खुलकर करने से बचती रहीं। 


दोनों पार्टियों की सोच यही रही कि अगर उन्होंने गैरसैंण जैसे पर्वतीय क्षेत्र में राजधानी को लेकर सकारात्मक रुख प्रदर्शित कर दिया तो राज्य की मैदानी क्षेत्र में स्थित 35 विधानसभा सीटों पर मतदाता उनसे विमुख हो सकता है। जहां तक पर्वतीय क्षेत्र की 35 विधानसभा सीटों का सवाल है, यहां तो पिछले 19 सालों से ये दोनों पार्टियां मतदाता को टहलाते रहे ही।


अब भाजपा सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर इस मुद्दे पर प्रतिद्वंद्वियों पर स्पष्ट बढ़त बना ली है। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि राज्य की स्थायी राजधानी को लेकर अब शायद किसी तरह की कोई ऊहापोह नहीं दिखेगी। गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी तो देहरादून स्वत: ही उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बन जाएगा।


कौशिक समिति 


चार जनवरी 1994 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने नगर विकास मंत्री रमाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति का गठन किया। यहीं से उत्तराखंड के रूप में अलग राज्य निर्माण की नींव पड़ी। समिति ने गैरसैंण को राजधानी का एक विकल्प बताया था।


देहरादून अस्थायी राजधानी 


केंद्र की राजग सरकार ने नौ नवंबर 2000 को देश के 27 वें राज्य के रूप में उत्तरांचल का गठन किया। बाद में राज्य का नाम उत्तराखंड कर दिया गया। नित्यांनद स्वामी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और अस्थायी राजधानी बनाया गया देहरादून को।


एकल सदस्यीय आयोग 


राज्य की स्थायी राजधानी के चयन के लिए जस्टिस वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में राज्य की पहली अंतरिम भाजपा सरकार ने वर्ष 2001 में आयोग बनाया। बाद में तिवारी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने इसे पुनर्जीवित किया। 11 एक्सटेंशन के बाद आयोग ने 17 अगस्त 2008 को सरकार को रिपोर्ट सौंपी, जिसे 16 जुलाई 2009 को विधानसभा के पटल पर रखा गया। तब से यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में है।


कैबिनेट और विधानसभा सत्र


वर्ष 2012 में कांग्रेस के सत्ता में आने पर पहली बार गैरसैंण को तवज्जो मिलनी शुरू हुई। तत्कालीन सरकार ने यहां कैबिनेट बैठक आयोजित की। इसके बाद नौ से 12 जून 2014 तक गैरसैंण में टेंट में पहला विधानसभा सत्र आयोजित किया गया। वर्ष 2018 तक गैरसैंण में हर साल एक सत्र का आयोजन हुआ, लेकिन पिछले वर्ष यह क्रम टूट गया। इस बार फिर यहां बजट सत्र आयोजित किया गया है।


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