‘‘स्वजनं तर्पयित्वा यः शेष भोजी सोऽमृत भोजी।।’’

 



‘‘स्वजनं तर्पयित्वा यः शेष भोजी सोऽमृत भोजी।।’’
अर्थात स्वजनों को तृप्त करके शेष भोजन से जो अपनी भूख शांत करता है, वह अमृत भोजी कहलाता है। जो राजा अपनी प्रजा की जरूरतों को पूरी करके अपनी जरूरतें पूरी करता है, वह उसी तरह है जैसे किसी ने अमृत पान कर लिया हो। जो राजा केवल अपने लिए सोचता है वह पापी होता है। आचार्य चाणक्य ने देश के राजा के चरित्र को जिस प्रकार परिभाषित किया है, वो आज की स्थिति को देखते हुए केवल कल्पना मात्र कही जा सकती है। मैंने किसी विद्वान लेखक का ब्राहमण के प्रति मक्तव्य पढ़ा जो कि दिल को छू गया। मुझे विद्वान लेखक का नाम तो ध्यान नहीं किन्तु आज की परिस्थितियों के अनुसार यहां उस मक्तव्य का उल्लेख करना सर्वथा उचित रहेगा, ऐसा मुझे लगता है।
ब्राहमणः- जिसे डर नहीं, जो लालच से घ्रणा करता है, जो दुख पर विजय पाता है, जो अभाव की परवाह नहीं करता, जो ‘परमेब्रह्माणी योजितचितः है, जो अटल है, शान्त है, मूर्त है- उस ब्राहमण को भारत वर्ष चाहता है। सचमुच उसे पा लेने से ही भारत विश्वगुरू बन सकेगा। हमारे समाज के प्रत्येक अंग में, प्रत्येक कम्र में, अनवरत मुक्ति का स्वर गुंजाने के लिए ब्राहमण चाहिए। केवल खाने और घण्टी बजाने के लिए नहीं। समाज की सार्थकता को हर समय समाज की आंखों के सामने प्रत्यक्ष किये रहने के लिए ही ब्राहमण चाहिए। ब्राहमण के इस आदर्श को हम जितना बड़ा अनुभव करेंगे, ब्राहमण के सम्मान को भी उतना ही बड़ा करके रखना होगा। वह सम्मान देवता का ही सम्मान है। जब ब्राहमण देश में इस सम्मान का यथार्थ अधिकारी होगा, तब तक इस देश को कोई अपमानित नहीं कर सकेगा। 
हम लोग क्या स्वंय राजा के सामने सर झुकाते हैं ? अत्याचारी का बंधन गले में पहनते हैं ? अपने डर के सामने ही हमारा सर झुकता है। अपने लालच के जाल में ही हम बंधे हैं। अपनी मूढ़ता के ही हम दासा-नुदास हैं। जो लोग ऐसा मानते हैं कि ‘सत्य हम पर निर्भर करता है, सत्य पर हम निर्भर नहीं है, उन्हीं को तो कठमुल्ला कहते हैं। सत्य की शक्ति पर जिन्हें विश्वास है, वे अपने बल को संयत रखते हैं। किसी तुच्छ संकोच के कारण सच्चाई को स्वीकार न कर सकना बहुत बड़ी क्षति है।