पर्यावरण संरक्षण में यज्ञ (हवन) की महत्ता !


डॉ. नरेश कुमार चौबे । हम प्रतिवर्ष 05 जून को पर्यावरण दिवस मनाते हैं। क्या वास्तव में हम पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को समझते और महसूस करते हैं। या फिर एक दिन या एक सप्ताह सेमिनार, गोष्ठियाँ आयोजित की और फिर सब कुछ सरकारी तंत्र के हवाले। विश्व पयावरण दिवस का श्री गणेश स्टौकहोम में 1972 में हुए अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हुआ। जिसमें कहा गया था कि हम अपने पर्यावरण के प्रति जागरूक बनकर इसे प्रदूषितहीन रखें, और इसके संरक्षण पर ध्यान दें। " जब तक आविष्कारों का संबंध उसके भरण-पोषण तक सीमित रहता है, तब तक वे सुखकर और उपादेय है। और जहां उन्होंने उस परिधि का उलंघन किया वे संहार का साधन बन जाते हैं। प्रकृति के साथ सहयात्रा मानव जीवन को सुखी और सम्पन्न बनाती है। उसके विरूद्धाचरण से वह और घातक हो जाती है। पौराणिक काल से ही हमारे ऋषि-मुनियों, पूर्वजो ने प्रकृति के द्वारा दिये गये इस अनमोल खजाने की रक्षा के सूत्र भी बताये हैं। जैसा कि वेदों में भी कहा गया है कि :


अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यान्यादन्नसम्भवः ।


यज्ञादभवति पर्जन्यो यज्ञ कर्म समुद्भवः ।।


अर्थात सारे प्राणी अन्न पर आश्रित हैं, जो वर्षा से उत्पन्न होता है। वर्षा यज्ञ सम्पन्न करने से होती है, और यज्ञ नियत कर्मों से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार शरीर के अंग पूरे शरीर की सेवा करते हैं। उसी प्रकार सारे देवता परमेश्वर की सेवा करते हैं। इन्द्र, चन्द्र तथा वरूण जैसे देवता भगवान द्वारा नियुक्त अधिकारी हैं। जो सांसारिक कार्यों की देख-रेख करते हैं। सभी वेद इन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञों का निर्देश देते हैं। जिससे वे अन्न उत्पादन के लिए प्रचूर वायु, प्रकाश तथा जल प्रदान करें।



यज्ञ के धुंए से प्रदूषण की भ्रांति :- आधुनिकता की इस अन्धी दौड़ ने हमें विनाश की ओर बढ़ने पर मजबूर कर दिया है। बहुत से लोग जो पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और अधकचरे ज्ञान के कारण ये कहते सुने गये हैं कि यज्ञ के धुंए से प्रदूषण होता है, आंखें खराब होती हैं दरअसल गलती उनकी भी नहीं है। गलती समाज के पौंगा पण्डितों की है जो हवन (यज्ञ) तो कराते हैं लेकिन उसे केवल धर्म का आधार या अपनी रोजी-रोटी से जोड़कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। हवन (यज्ञ) की महत्ता को प्रकृति के संरक्षण से जोड़कर कभी देखते ही नहीं। हवन (यज्ञ) को तंत्र-मंत्र की साधना बताकर धार्मिक रूप से भावनाओं का शोषण किया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के संतुलन को बनाये रखने के लिए यज्ञ पद्धति निर्मित की। इसे धर्म के अनुसार प्रकृति की रक्षा करना भी कहा जा सकता है।


हवन में चार प्रकार के हव्य पदार्थ डाले जाते हैं। जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। अनेकों तरह की बाधाओं, बीमारियों से हमें बचाते हैं।


1. सुगन्ध – केसर, अगर, तगर, गुग्गल, कपूर, चन्दन, इलायची, लौंग, जायफल, जावित्री आदि।


2. पुस्टिकारक – घृत, दूध, फल, कन्द, मखाने, अन्न, चावल, जौं, गेंहूँ, उड़द आदि


3. मिष्ठान - शक्कर, शहद, छुहारा, किसमिस, दाख आदि


4. रोग नाशक - गिलोय, ब्राहमी, शंखपुष्पी, मुलहठी,सौंफ, तुलसी, आदि औषधियां।


यहां इन सामग्रियों का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक लगा कि जो लोग हवन से प्रदूषण की बात करते हैं उन्हें भी ये ज्ञान हो जाए कि यज्ञ में डाले जाने वाले हव्य वातावरण के लिए कितने आवश्यक हैं।


आज पर्यावरण संरक्षण के लिए हमारी सरकारें खरबों रूपया सरकारी खजाने का लुटा रही हैं। फिर भी दिन-प्रतिदिन प्रकृति का संतुलन बिगड़ता ही जा रहा है। क्या वास्तव में हम प्रकृति के असन्तुलन और दूषित होते वातावरण के प्रति कभी गम्भीर हुए भी हैं या फिर केवल शोर ही मचाते हैं। वास्तव में पर्यावरण संरक्षण एक बहुत ही गम्भीर विषय है। मैं यहां पिछले कुछ दशकों के उदाहरण और आज के हालात पर चर्चा कर रहा हूँ। कहा जाता है कि " आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है।" जिस तरह से देश की जनसंख्या बढ़ी, आवश्यकताएं भी उसी अनुरूप में बढ़ीं कहीं परिवारों के भरण-पोषण तो कहीं व्यापार के नाम पर तो कहीं आवास के नाम पर हमने जरूरत से ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है।


ग्रेस क्रूजर ने सही कहा है:


न छेड़ो प्रकृति को , अन्यथा एक दिन माँगेगी हमसे,


तुमसे अपनी तरूणायी का एक-एक क्षण और करेगी भयंकर. ..बगावत।....


और शायद प्रकृति आज बगावत पर ही उतारू है देश में जहां देखो वहां भूमि का प्रदूषण, जल का प्रदूषण, अग्नि का प्रदूषण, वायु का प्रदूषण, आकाश का प्रदूषण, कुल मिलाकर पांच तत्वों का प्रदूषण प्राणी मात्र के लिए घातक है।


डॉ. किशोर काबरा ने अपनी लेखनी के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए लिखा है कि:


"धुंआं उगलती चिमनियां, कुंआं निगलते खेत।


शहर-गांव दोनों हुए, भूखे-नंगे प्रेत।।


नदियां बस विधवा हुई, सूनी और सपाट ।


कल-कल वाले घाट सब, दल-दल वाले घाट |


सड़कें चौराहे हुईं, चौराहे बाजार बाजारों में बिक रहे, मरघट के औजार |


पेड़ कटे, जंगल जले, गांव हुए बरबाद ।


शहरों बीच सीमेंट के, जंगल हैं आबाद ।।


कीचड़, मच्छर, गंदगी, अंधकार का राज।


नगर पालिका हो गई, नरक पालिका आज ।।


अनावृष्टि, अतिवृष्टि ही केवल मुझको याद ।


सुधा वृष्टि देखी नहीं, आजादी के बाद ।।


अथर्ववेद में कहा गया है कि " हमारी जिस प्रथ्वी में मनुष्य यज्ञ करते हैं और उसमें उत्तम पदार्थों का हवन करके वायु और जल आदि को शुद्ध करते हैं। जिस भूमि में यज्ञों के कारण उत्तम वृष्टि होकर विपुल अन्न उपजता हैं जिससे मनुष्य आनंद पाते हैं वह मातृभूमि हमको उत्तम प्राण और पूर्ण आयु देने वाली है। अग्नि से ताप (धूप) उत्पन्न होता है, धूप से बादल बनते हैं ओर बादल से वर्षा होती है, जैसे वाक्य यज्ञ के पर्यावरणीय महतव को रेखान्कित करते है। यज्ञ वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वायुमण्डल में आक्सीजन (0) और कार्बन डाई आक्साइड (CO) का संतुलन बना रहता है। प्रकृति में एक नैसर्गिक चक्र की व्यवस्था है। जिसके अनुसार प्रत्येक पदार्थ अपने मूल स्थान तक पहुंचता है। इसी आधार पर दिन-रात, ऋतु, वर्षा, सूर्य, चन्द्र आदि व्यवस्थित हैं। इसी प्राकृतिक चक्र को परिभाषिक शब्दावली में यज्ञ कहा गया है।


क्रमशः


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