असंतुलित पर्यावरण और हमारा देश !


भारतीय दृष्टि सम्पूर्ण प्रकृति एवं प्राणधारियों के जीवन से ओत-प्रोत रही है। " माता भूमिः पुत्रेऽहं पृथिव्याः ।" जैसी भावना विश्व की किसी संस्कृति की नहीं रही है। यही कारण है कि पृथ्वी अंतरिक्ष एवं मृत्युलोक को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक शक्तियों में ही देवत्व की कल्पना नहीं की, अपितु पहाड़, वृक्ष, नदी, पशु आदि भी देवत्व से अछूते नहीं रहे। पावर्ती का हिमालय पुत्री होना, भगवान के वाराह, नृसिंह अवतार, दुर्गा आदि की पशु सवारियाँ । पीपल, बरगद, तुलसी आदि की पूजा। बंदर, गौरैया, तोता-मैना की कथाएं ही नहीं, विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ पंच-तंत्र की पशुओं पर आधारित नीति कथाएं आदि सिद्ध करती हैं कि भारतीय जन-जीवन किस प्रकार मानवेत्तर सृष्टि में रचा बसा है। नदियों की पूजा भी जल के पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित करती है। वैज्ञानिकों ने भी वनस्पतियों में जीवन की बात सिद्ध कर दी है। आयुर्वेद शास्त्र जो कि वृक्ष व वनस्पतियों पर ही आधारित है, यह सिद्ध करता है कि भारतीय ऋषि-मुनि वृक्षों, वनस्पतियों एवं उनके पलने-बढ़ने आदि पर कितना ध्यान देते थे। यहां तक कि एक वृक्ष को लगाने का पुण्य दस पुत्रों के बराबर कहा गया है। पीपल, तुलसी, नीम जैसे पेड़ पौधों के पर्यावरणीय महत्व को आर्य संस्कृति जानती थी, इसलिए उन्हें इतना सम्मान दिया गया है। महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत में कहा है कि "फूलों और फलों से समृद्ध वृक्ष मानव को इस लोक में तृप्त करते हैं जो मनुष्य वृक्ष का दान करता है, उसे ये वृक्ष पुत्र के समान परलोक में तार देता है।


" हिन्दी कवि अशोक 'अंजुम ने पिछले दशक में अपनी कविता के माध्यम से वृक्षों के कटने पर अपना रोष प्रकट करते हुए कहा है कि :


जब से डाली कटी नीम की, आना-जाना भूल गई।


सदमा खाकर इक दीवानी, बुलबुल गाना गाना भूल गई ।।


गुलशन के माली का रिश्ता आरी से यूं गहराया।


इक दिन उसने ताव में आकर सारे तरूवर काट दिये ।।


हरे राम 'समीप” ने थोड़ा और अधिक कटाक्ष करते हुए कहा है कि :


सोच रहे हें पेड़ सब, सहमे और चुपचाप।


आखिर क्यों होने लगी, इस जंगल की माप।।


इन पंक्तियों को लिखने का तात्पर्य यह है कि पर्यावरण को लेकर जितनी चिंता आज हमारे राजनेताओं और वैज्ञानिकों को होती है, उससे कहीं अधिक चिंता हमारे हिंदी साहित्यकारों में भी दृष्टिगत होती है। जंगलों के विनाश को हिन्दी सिनेमा जगत ने ढंग से भुनाया और खूब पेसा कमाया, लेकिन समस्या जस की तस कहा भी गया है कि दवा होती रही लेकिन रोग बढ़ता ही गया उसकी एक ही वजह है कि मज्र कुछ और था और दवा किसी और रोग की दी जाती रही। यही हाल आज भी हो रहा है। प्रदूषण की वजह कुछ और है, लेकिन दिल्ली सरकार के पढ़े लिखे बुद्धिजीवी मुख्यमंत्री किसानों की पराली जलाये जाने को प्रदूषण का मुख्य कारण मानते हैं। उन्हें कौन समझाये कि पराली के धुंए से वायुमंडल में तटस्थ बादल नहीं बनते । तटस्थ बादलों को भारी हवाएं भी नहीं तोड़ पातीं।


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मैं कृषि क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति ये तो मान सकता हूँ कि पराली जलाने से हम किसी न किसी रूप में अपनी भूमि उर्वरा शक्ति को कम कर रहे हैं क्योंकि कृषि योग्य भूमि में आग के तापमान से अनेकों ऐसे जीव भी नष्ट हो जाते हैं जो किसान मित्रों की श्रेणी में आते हैं। खैर ये बहस के विषय हैं और मैं किसी राजनीतिक बहस में पड़ना नहीं चाहता।


आज जो देश के हालात हैं, वो बहुत की चिंताजनक हैं। इसकी मुख्य वजह है बढ़ती हुई जनसंख्या जो किसी विस्फोटक से कम नहीं है। हम विस्फोटक जनसंख्या को लेकर विश्व में दूसरे स्थान पर हैं, जबकि संसाधन सीमित हैं। किसी ने सात-सात पीढ़ियों तक के संसाधन हये हैं तो किसी के पास एक वक्त की रोटी के भी लाले हैं। भारत देश में संसाधनों का दोहन और अधिक जोडने की प्रवति ने सब कछ तहस-नहस कर दिया है। इस विस्फोटक जनसंख्या को नियंत्रित न कर हम विकास की ओर बढ़ रहे हैं किन्तु हम विकास के नाम पर कहीं विनाश की ओर तो नहीं बढ़ रहे । ये ठीक है कि प्रगति के लिए विकास आवश्यक है, किन्तु विकास करते-करते हम ये क्यों भूल जाते हैं कि प्राणी मात्र के जीवन के लिए पर्यावरण का संतुलन बना रहना भी आवश्यक है। कहीं हम विकास की आड़ में प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन तो नहीं कर रहे।


ज की तारीख में विकास का मल मंत्र सडक कारखाने हवाई जहाज, बलेट टेने आदि ही नहीं हैं। विकास के लिए भारतीय संस्कति में एक शब्द का प्रयोग किया गया है "सर्वांगीण विकास' अर्थात जिस तरह हमें चलने के लिए सड़क चाहिए उसी तरह जीवन के लिए स्वच्छ हवा भी चाहिए। लेकिन ये स्वच्छ हवा आयेगी कहां से ! कभी इस पर हमने विचार किया है ? हमारे आस-पास अधिक से अधिक हरियाली हो, सड़कों के किनारे फलदार, छायादार ऊँचे वृक्ष हों जो शीतल छाया दें, ठण्डी हवा दें और खाने को मीठे स्वादिष्ट और पौष्टिक फल दें। प्राणी मात्र को जीवन जीने के लिए ऑक्सीजन पौधों द्वारा ही मिलती है। इसी प्रकार मानसून भी जब ऊँचे पर्वतों और वृक्षों से टकराता है तब वर्षा होती है। अर्थात ऊँचे व छायादार वृक्ष अच्छे मानसून के लिए भी उपयोगी होते हैं हमारा प्रयास यही होना चाहिए कि हम प्रकृति का संतुलन बनाकर ही विकास के लिए उचित संसाधनों का दोहन करें। यह आवश्यक भी है क्योंकि पृथ्वी के हर प्राणी को स्वच्छ हवा, साफ पानी चाहिए ताकि पृथ्वी पर स्वछन्दता से जीवन यापन कर सके। 


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